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उम्र से बड़े हैं , संकल्प :-

दस साल की बाली, खेलने – कूदने की उम्र में झाबुआ के सिद्धम जैन, चल पड़े हैं मुनि बनने के कठीन मार्ग पर |
इन्दौर में मुनि श्री चंद्रसागर जी महाराज के नेतृत्व में ली दीक्षा | वे श्वेताम्बर जैन हैं , तथा उसी का पालन करते आ रहें हैं।

पाँच साल की उम्र से टीवी नहीं देखा, मोबाइल नहीं चलाया, बिना पंखे, प्रिज ,इंटरनेट, वीडियो का इस्तेमाल नहीं किया और रात के भोजन का भी त्याग कर रखा है। उन्हें संत जीवन का ज्ञान व समझ तभी आ गई थी | वे 4:30 बजे प्रातः उठते हैं तथा बिना स्नान किए कच्चे पानी को छुए , हर एक दिन छोड़कर उपवास करते हैं, और यह क्रम पाँच साल से ही चला आ रहा ।

सिद्धम पाँच साल पहले, गुरुजी जैन आचार्य श्री जिनचंद्र सागर सुरीश्वरजी महाराज के पास आया था तभी से धर्म के प्रति रुचि जागी।
माता प्रियंका जैन का कहना है, कि वे दिक्षा लेना चाहती थी, मगर नहीं ले पाई पर अपने बेटे को इतना तैयार किया और उसने उनका सपना पूरा किया। प्रियंका ने बताया कि बचपन से ही वह सिद्धम को मुनि – आचार्य के पास ले जाती थी, और उन्हें मालूम था कि सिद्धम संयम लेगें।
माता-पिता ( प्रियंका – मनीष जैन) दोनों ही बहुत खुश हैं तथा शोभायमान महसूस कर रहें हैं।
सिद्धम को 500 से ज्यादा श्लोक कंठस्थ याद हैं तथा उनका कहना है कि अब वह 6 निकायों के जीवों की हिंसा से बच पाएंगें तथा अपनी आत्मा का कल्याण कर सकेगें। वे अपने नए नाम को पाने के लिए भी उत्साहित है |

सिद्धम के साथ- साथ कई और बच्चे भी धर्म के मार्ग से जुड़े हैं । जैसे :- रतलाम की दो जुड़वाँ बहनें व एक 10 वषीर्य बच्चे ने भी संसारिक जीवन त्याग कर वैराग्य की राह पाई ।
इस बालक का भव्य दीक्षांत समारोह इन्दौर में आयोजित हुआ और आयोजन में भीषण गर्मी होने के बाद भी बहुत ज्यादा भीड़ उमड़ी श्वेताम्बर जैन समाज के इन 20 प्रमुख संतों का प्रवेश कालानी नगर जैन मंदिर में हुआ ।
ये सभी संत मंडल गुजरात से 600 कि.मी. का विहार कर, पैदल एक महिने तक का सफर तय कर आए हैं। लोगों ने बाइक रैली कर जोश भी जताया।

सिद्धम के मुनि बनने का संकल्प हुआ पूरा …  तीन साल बाद खाया रसगुल्ला | 

सिद्धम में पहला दिन ह्रिंकारगिरी तीर्थ छेत्र में साधु जीवन के नियमों का पालन कर बिताया तथा फिर उन्होंने 9 कि.मी. का विहार पौने दो घंटों (1hr 45 min) में पीपली बाजार उपाश्रय तक तय किया |
पहली गोचरी (भोजन) उन्होंने अपनी माँ प्रियंका जैन के हाथों ली। प्रियंका ने बताया की तीन साल पहले सिद्धम ने संकल्प लिया था कि साधु बनने के बाद ही रसगुल्ले खाँएगें | माता ने गोचरी (भोजन) में रसगुल्ले दिए तथा उन्होंने प्रथम गोचरी में रसगुल्ले, फल, दूध, मिठाई ग्रहण किए ।

सिद्धम ने संसारिक जीवन को पूर्णतः त्याग दिया तथा अपने माता – पिता, नाम तक को छोड़, आत्मा का कल्याण करने , वे मोक्ष मार्ग की प्राप्ती की कामना करते हुए, मुनि जीवन को धार लिया |

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