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झाँसी के शिल्पकार बिक्री में गिरावट और सरकारी प्रोत्साहन की कमी

निष्ठा पांडेय झांसी।भले ही सिल बट्टा और आटा चक्की हर उत्तर भारतीय घर का एक अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन झांसी में इन्हें बनाने वाले शिल्पकार बिक्री में गिरावट, कम बाजार मूल्य और सरकारी सहायता नहीं होने के कारण जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।झाँसी के शिल्पकार बिक्री में गिरावट और सरकारी प्रोत्साहन कि कमी के वजह से अपनी कला के सहारे अपना गुज़ारा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं

“पत्थर एक बार कोई ले लेता है तो ज़िंदगी भर का हो जाता रोज़-रोज़ तो कोई खरीदता नहीं है,” 55 वर्षीय कुसुमा कुमार कहती हैं, जो पांच साल की उम्र से पत्थरों को तराश रही हैं और सिल बट्टा बना रही हैं।

कुमार पिछले 22 सालों से उत्तर प्रदेश राज्य के झांसी शहर की शिल्पकार गली में रह रही हैं। वह पांच साल की उम्र से “सिल बट्टा” बना रही हैं। एक छोटे से सिल बट्टे- जो एक पारंपरिक रसोई उपकरण जिसका उपयोग चटनी और मसालों को पीसने के लिए किया जाता है उसको छेनी से तराश के बनाने में तीन से चार घंटे लगते हैं। हर सुबह करीब छह बजे, वह अपने हथोड़े और पत्थर की चोट सी भरी हथेलियों से वापिस सिल बट्टा बनाना शुरू करती है। हथोड़े को एक हाथ में पकडे हुए और पत्थर को अपने पैरो के बीच रखकर वह उसपे सटीक वार करती है पत्थर और फिर छेनी सिल बट्टा को उसका गोल आकर देती है। एक बार जब वह काम पूरा कर लेती है, तो वह जूट के थैले में लगभग तीन या चार सील बट्टों को पैक करती है, जिनमें से प्रत्येक का वजन एक या दो किलो होता है, और उन्हें बेचने के लिए आस-पास के इलाकों में जाती है। “इलाके के लोग जो महंगे मिक्सर ग्राइंडर का खर्च नहीं उठा सकते, वे यह सिल्ट बट्टा खरीदते हैं। कभी-कभी लोग हमारी बस्ती में उन्हें खरीदने आते हैं, ”वह कहती हैं।

झाँसी की यह शिल्पकार बस्ती कुसुमा जैसे शिल्पकारों से भरी हुई है। शिल्पकार समुदाय झांसी की रानी रानी लक्ष्मी बाई के युग से चला आ रहा हैं उस समय ये शिल्पकार छेनी और हथौड़े से पत्थरों को तराश कर मूर्तियां और बर्तन बनाते थे। भारत की स्वतंत्रता और देश में शाही युग के अंत के बाद, इनमें से कुछ लोग आगरा, वाराणसी और बांदा जैसे राज्य के अन्य हिस्सों में चले गए जहां उन्होंने अन्य स्थानीय कारीगरों के साथ काम किया और पत्थर काटकर शिल्पकारी करने का काम जारी रखा।

समुदाय के कुछ लोग जिन्होंने अपने पूर्वजों से ये कला सीखी थी, अब शहर के सिपरी बाजार के पास एक छोटी सी गली में रहते हैं। झांसी में इन शिल्पकारों द्वारा किए गए प्राथमिक कार्य में अब भगवान की मूर्ति, नेमप्लेट, आटा चक्की और पारंपरिक सिल बट्टा शामिल है जो मसाला मिश्रण तथा चटनी तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक पुराना घरेलू उपकरण है। जैसे ही कोई शिल्पकार बस्ती लेन में प्रवेश करता है, आप विभिन्न शिल्पकारों या कलाकारों को सिल बट्टा, चक्की और मूर्तियां बनाते हुए देखेंगे।

शिल्पकारों द्वारा इस्तेमाल किए गए पत्थरों में झांसी लाल ग्रेनाइट, संगमरमर और सज्जर पत्थर शामिल हैं। आज भी बस्ती में कई शिल्पकार हाथ में हथोड़े और छेनी लेकर पथरों को मार-मार देते है और सिल बट्टे बनाते हैं। वही समय के साथ-साथ आधुनिकता से आगे बढ़ते हुए कई शिल्पकार अब पत्थर पर डिजाइनों को तराशने के लिए स्टोन कटर जैसे बिजली के उपकरणों का भी उपयोग करते है। लेकिन फिर भी पत्थर को आकार देने का अधिकांश काम अभी भी हथौड़ों और छेनी द्वारा किया जाता है। समुदाय की महिलाएँ और पुरुष दोनों इस काम में सक्रिय रूप से अपना योगदान देते हैं. शिल्पकारो के अनुसार पत्थर काटना और सिल बट्टे तथा मूर्तियां बनाना उनके परिवार में एक ‘प्रथा’ (परंपरा) के रूप में सदियों से चला आ रहा है।

परन्तु गिरती हुई बिक्री तथा इस कला में बढ़ती आर्थिक लाभ कि कमी के कारण शिल्पकारों को इस प्रथा का अंत नज़दीक नज़र आ रहा हैं। अब उनकी मदद करने के लिए सरकार की कोई नीति नहीं होने के कारण, कर्ज में डूबे शिल्पकार बस्ती के लोग अपना और अपने परिवार का गुजरा करने के संघर्ष कर रहे है।

कुसुमा जैसे कारीगर, जो हाथ से सिल बट्टा बनाते हैं, एक सिल बट्टा को आकार देने और डिजाइन करने के लिए दिन में लगभग सात से आठ घंटे खर्च करते हैं, जिसे बाद में वे इन सिल बट्टो को बाजार में ले जाते हैं और एक सिल बट्टा लगभग 200-300 रुपये में बेचते हैं।
“मैं सारा दिन बैठकर एक पत्थर तराशती हूँ और फिर अगर वह बिकता है तो हमें उस दिन कुछ खाने के लिए कुछ पैसे मिलते हैं। पहले लोग काफी सिल बट्टे खरीदते थे लेकिन अब मिक्सर जैसे आधुनिक उपकरण बाज़ार में आ गए हैं इसलिए हमारी सिल बट्टों कि बिक्री बहुत गिर गई है। कभी-कभी पूरा एक हफ्ता बीत जाता है और हम कुछ नहीं बेचते हैं,” वह आगे कहती हैं।
मिटटी और ईट से बनी तीन दीवारें जो बम्बू के बॉस टिकी हुई है, और छत पर टूटी फूटी एल्युमीनियम कि पट्टी कुसुमा का घर है। हालाँकि कुसुमा और बस्ती के अन्य लोगों को प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना से लाभ प्राप्त हुआ था, जिसके तहत उन्हें एक स्टोव और एक एलपीजी सिलेंडर कनेक्शन मिला था। फिर भी, बिक्री में उतार-चढ़ाव के कारण, उस एलपीजी सिलेंडर को खरीदना उनके लिए काफी महंगा पड़ता है। इसकी वजह से वहां आज भी कई घरों में खाना चूल्हे में बनता हैं, क्योंकि वह लोग एलपीजी सिलेंडर खरीदने का खर्च नहीं उठा सकते हैं।

इसके साथ-साथ कोरोना वायरस महामारी और उसके बाद के लॉकडाउन कि वजह से शिल्पकारों के लिए अपना व्यापर वापिस स्थिरता पे लाना मुश्किल हो गया हैं।
एक और समस्या जिसका सामना इन शिल्पकारों को करना पड़ता है, वह है क़ानूनी तौर पे इनके घरों पर इनका अधिकार ना होना। यहाँ रहने वाले सरे शिल्पकार पहले शहर के तहसील क्षेत्र में रहते थे जहां से उन्हें सं 2000 में सीपरी बाज़ार के पास इस गली में स्थानांतरित कर दिया गया था। तब उनके मुताबिक उन्हें 15/30 का प्लाट सौंपा गया था।
एक शिल्पकार लाल बहादुर शास्त्री ने हमे ये जानकारी दी की, “सं 2000 से हम लोग बार-बार हमारे घरो कि रजिस्ट्री और यहाँ पर मूल सुविधाएँ जैसे पानी, टॉयलेट इतियादी कि प्राप्ती लिए हम कई शिकायतें कर चुके हैं, कई अर्ज़ियाँ डाल चुके हैं परन्तु अभी तक हमे कोई लाभ नहीं मिला इसके साथ साथ हमे विस्थापन के लिए कोई मुआवजा भी नहीं दिया गया था,”
शिल्पकारों ने आगे ये भी बताया कि जिस जमीन उन सब ने घर बनाए हैं, वह झांसी नगर निगम की है, इसलिए उन्होंने जो घर बनाए हैं, उनका पंजीकरण नहीं है। उनके अनुसार, पीएम आवास योजना (पीएमएवाई) के तहत नेताओ ने उन्हें घर दिलाने के वादे किये थे उनसे फॉर्म भी भरवाए थे परन्तु इसके बावजूद उन्हें अभी भी सरकार द्वारा आवास उपलब्ध नहीं कराया गया है। इस गली में रहने वाले शिल्पकार हर दिन इस डर में रहते हैं कि अगले दिन नगर निगम आकर उन्हें फिर से उनक उनके घरो को काम से विस्थापित कर देगा

नरेंद्र कुमार जिनका परिवार रानी लक्ष्मीबाई के जमाने से पत्थर के बर्तन बनाता आ रहा है कहते हैं, “हमें हस्तशिल्प कलाकारों के लिए बनाई गई योजनाओं के तहत कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती है क्योंकि पत्थर पर शिल्पकारी करना इन योजनाओं के तहत नहीं आते। झांसी महोत्सव में हमें अपनी मूर्तियां बेचने के लिए सरकार द्वारा प्रदान की गई कोई जगह नहीं मिलती है। हमारे काम को बढ़ावा देने के लिए कोई पहल नहीं हो रही है।”
कारीगरों के अनुसार, समुदाय के अधिकांश लोग पत्थर काटने से होने वाली धुल में काम करने के कारण 50 वर्ष की आयु से अधिक या तो जी नहीं पते हैं या फिर स्वस्थ रूप से जीवन व्यतीत नहीं कर पाते हैं।
हथौड़े और छेनी के काम से हथेली चोट लगना आम बात हैं, ये इतना आम है कि अब महिला शिल्पकारों के हाथों के लिए पट्टियां नया आभूषण बन चुकी हैं। साथ ही शौचालय न होने के कारण समुदाय की महिलाएं भी शौच के लिए बाहर जाते समय कुछ गलत हो जाने के भय में रहती हैं।
कम बिक्री के साथ, उत्थान के लिए कोई सरकारी योजना का ना होना, घरों कि रजिस्ट्री ना होना, बिजली पर कोई सब्सिडी का ना होना और पूरी गली में 20 से अधिक शिल्पकार परिवारों के लिए सिर्फ एक हैंडपंप और एक सरकारी शौचालय का होना शिल्पकारों के लिए बहुत बड़ी दिक्कत है। अब इस गली में रहने वाले शिल्पकार पूर्वजों से चली आ रही अपनी इस कला को बनाए रखने के लिए और अपना तथा अपने परिवार का गुजरा चलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
भारत सरकार के पास हस्तशिल्प कलाकारों के उत्थान के लिए एक प्रमुख योजना है जिसे बाबा साहेब अम्बेडकर हस्तशिल्प विकास योजना कहा जाता है। इस योजना का लाभ झांसी के शिल्पकार समुदाय को नहीं मिलता हैं क्यूंकि पत्थर की नक्काशी झाँसी शहर की एक प्रमुख कला नहीं है।
निवास के मुद्दों के संबंध में, झांसी नगर निगम के संपत्ति विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा:
“जिस जमीन पर शिल्पकार बस्ती बनी है, वह नगर निगम की है। इसलिए कोई सरकारी प्रोजेक्ट आने पर हमें उन्हें विस्थापित करने का पूरा अधिकार है। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि अगर वे विस्थापित होते हैं तो उन्हें पीएमएवाई के तहत उचित आवास मुहैया कराया जाए।
२० फरवरी को झाँसी शहर में मतदान हैं। शिल्पकारों का कहना हैं कि मतदानो को मद्देनज़र रखते हुए जनवरी के महीने में कई पार्टियों के नेताओ ने आकर उन्हें वोट देने पर शिल्पकारों कि दिक्कतों को दूर करने के वादे किये। परन्तु शिल्पकारों के हिसाब से कई इलेक्शन आए और कई वादे हुए परन्तु सुविधा के नाम पर शिल्पकारों को कुछ भी पप्राप्त नहीं हुआ है। इस शिल्पकारों का मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों द्वारा किए गए बड़े-बड़े वादों से अब भरोसा उठ चूका हैं।
“दलाली बिना हलाली नहीं होती” कहते हैं शिल्पकार नरेंद्र कुमार.

ख़तम होते इस शिल्पकारी के व्यवसाय को देखते हुए शिल्पकार समुदाय के लोगों कि अब अपनी आगे कि पीढ़ियों पर ही सभी उम्मीदें टिकी हुई हैं, वे चाहते हैं कि उनके बच्चे, शिक्षित हों इस गली से बाहर निकलें , पत्थर कि शिल्पकारी को ओर जगह आगे बढ़ाएं और एक उचित जीवन शुरू करें।
नरेंद्र कहते हैं, “मुझे उम्मीद है कि मेरे बच्चे बड़े होंगे और कुछ बनेंगे… नहीं तो उन्हें भी यहाँ पे रहकर ये मारा हुआ धंदा ही करना पड़ेगा।”

उत्तर प्रदेश राज्य भारतीय कारीगरों का केंद्र है। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के 29 फीसदी कारीगर उत्तर प्रदेश से हैं। इस राज्य के झाँसी शहर में प्रसिद्ध बाजार सीपरी बाजार के थोड़े पास शिल्पकारों कि एक बस्ती है। एक गली में बसी इस बस्ती के कुछ 500 मीटर दूर से हथोड़े और छेनी कि ठक-ठक और पत्थर काटने वाली मशीन की घड-घड कि आवाज़ से ही बस्ती में हो रहे काम कि भनक आपके कानो में पड़ जाती है। शिल्पकरो कि इस बस्ती में आपको चटनी बनाने वाले सिल बट्टे से लेकर पत्थर से भगवान मूर्ति तक, लगभग पत्थर से बननी वाली सारी चीज़े मिलेंगे। पूर्वजों से सीखी पत्थर काट शिल्पकारी करने के इस कला के सहारे पैसे कमाना और घर चलाना अब इन शिल्पकारों के लिए एक चुनौती बन गया है। सिल बट्टो की गिरती हुई बिक्री, सरकार कि तरफ से कोई बढ़ावा नहीं मिलना, बस्ती के घरो पे लटकती विस्थापन कि तलवार और बस्ती में बुनयादी जरुरतो की अनुपस्थिति ने शिल्पकार बस्ती के शिल्पकारों के लिए अपनी कला को बनाए रखना तथा अपना और अपने परिवार का गुजरा करना एक संघर्ष पूर्ण कार्य बन चूका है।

Authour- Nishtha Pandey

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