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क्यों ताइवान यूक्रेन नहीं है ?

नैंसी पेलोसी कि ताइवान दौरे के बाद से ही चीन की बौखलाहट देखने को मिली है. चीन ने ताइवान को 6 जगहों से घेर लिया है. परंतु चीन के लिए   ताइवान पर हमला करना इतना आसान नहीं होगा जितना रूस के लिए यूक्रेन पर हमला करना था.  क्योंकि  यूरोप और एशिया के हालात बहुत अलग हैं. यूरोप में रूस अकेली सैन्य महाशक्ति है. रूस के आसपास कोई भी देश नहीं है, साथ ही रूस दुनिया की सबसे ज्यादा परमाणु हथियार वाला देश है.   रूस ने यूरोप की धरती पर कई युद्ध लड़े हैं और उनमें अधिकतर में विजय पाई है.  रूस  की सेना  को  यूरोप के हालातों का अच्छा अनुभव है.   यूरोप के मजबूत देश जैसे ब्रिटेन और फ्रांस भी यह जानते हैं कि यूरोप में रूस को हराना आसान बिल्कुल नहीं है. रूस ही वह देश है जिसने द्वितीय विश्व युद्ध में नाजी जर्मनी को परास्त किया था.  इतने ज्यादा आधुनिक हथियार होने के बावजूद भी रूस को यूक्रेन पर कब्जा करने में समय लग रहा है.  रूस यूक्रेन युद्ध को  अब 5 महीनों से ज्यादा समय होने जा रहा है और रूस आज भी यूक्रेन की राजधानी पर कब्जा नहीं कर पाया है.

एशिया की स्थिति तो यूरोप से बिल्कुल भिन्न है. चीन ना सिर्फ ताइवान को आंखें तरेर ता है, बल्कि उसने अपने कई पड़ोसी देशों को भी परेशान कर रखा है. चीन की सीमा मंगोलिया, फिलिपिंस ,जापान, भारत से लगती है. इन सभी देशों से चीन के संबंध खटास में हैं. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अभी चीन ने ताइवान को 6 तरफ से घेर रखा है और उसने ताइवान की हवाई रूट को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया है . ताइवान की मदद करने के लिए फिलिपिंस, जापान जैसे देश सामने आए हैं और उन्होंने एक अलग रूट खोलने पर विचार किया है. एशिया में चीन के लिए सबसे बड़ी चुनौती जापान है. जापान चीन की नियत को बहुत पहले ही समझ चुका था और क्वाड जैसे संगठन को गठित करने में जापान ने एक मुख्य भूमिका निभाई है. जापान ने चीन के हरकतों को देखते हुए अपने डिफेंस बजट भी बढ़ा दिया है. अमेरिका ने भी साउथ चाइना सी में अपना युद्ध अभ्यास चालू कर दिया है.

इसके अलावा चीन बहुत सारी आंतरिक समस्याओं से भी जूझ रहा है. चीन की अर्थव्यवस्था की हालत सही नहीं बताई जा रही है. साम्यवादी व्यवस्था होने के कारण सही सूचना चीन से बाहर नहीं आ पाती हैं. बीते दिनों में हुए घटनाक्रमों को देखें तो चीन में सब कुछ सही नहीं है. हांगकांग और तिब्बत भी अपने को चीन का हिस्सा नहीं मानते. अगर चीन ताइवान पर हमला करता है तो इन देशों में भी चीन के खिलाफ गतिविधियां तेज हो जाएंगी. अमेरिका भी चीन को आंतरिक तौर पर अस्थिर करने की पूरी कोशिश करेगा.

वह पड़ोसी देश जिन्हें चीन ने परेशान कर रखा है. वह भी ताइवान को आर्थिक और सैन्य सहायता करेंगे. इस स्थिति में युद्ध लंबा खींचेगा और युद्ध  जितना लंबा खींचेगा उतना चीन के लिए आंतरिक समस्याएं पैदा होती जाएंगी.   रूस बहुत सारे प्रांतों का समूह नहीं है, लेकिन चीन कई प्रांतों का समूह है और बहुत सारे प्रांत खुद को चीन से अलग बताते हैं. साथ ही रूस ने अपनी अर्थव्यवस्था को गैस और तेल बेच कर संभाल लिया है. परंतु चीन के पास यह प्राकृतिक संसाधन नहीं है. चीन की अर्थव्यवस्था पूरी तरह निर्यात पर निर्भर है और अमेरिका चीन पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाएगा. ना सिर्फ अमेरिका बल्कि पूरे पश्चिमी देश चीन पर आर्थिक प्रतिबंध लगाएंगे.  इससे निश्चित तौर पर चीन की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा.
और इसके साथ साउथ चाइना सी में चीन के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऑस्ट्रेलिया है.  ऑस्ट्रेलिया ने भी चीन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है.  साथ ही वह देश जिन्होंने चीन से कर्ज लिया है वह भी  अब मुखर होकर चीन के खिलाफ आने लगे हैं. अगर पूरे हालात को देखा जाए तो चीन के किसी भी देश के साथ संबंध मधुर नहीं हैं, इसलिए  चीन का  ताइवान पर हमला करना इतना आसान नहीं होगा .   अगर चीन यह गलती करता भी है तो चीन की अर्थव्यवस्था पर रूस से ज्यादा बुरा प्रभाव पड़ेगा.

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