कर्नाटक में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी की बड़ी संख्या में पसंद
कर्नाटक में भाषा को लेकर चल रही बहस के बीच एक दिलचस्प तथ्य सामने आया है। जबकि ‘हिंदी थोपने’ की चर्चा जारी है, स्कूलों के आंकड़े एक अलग कहानी बयान करते हैं। इस शैक्षणिक सत्र में राज्य बोर्ड के लगभग 93 प्रतिशत विद्यार्थियों ने तीसरी भाषा के रूप में हिंदी चुना है।
रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष करीब 8.1 लाख छात्रों ने तीसरी भाषा का विकल्प esercitato। इनमें से 7.5 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने सामान्य पाठ्यक्रम के तहत हिंदी पढ़ने का निर्णय लिया। आदर्श विद्यालयों में एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के माध्यम से 4,778 छात्रों ने भी हिंदी का अध्ययन किया। इस प्रकार कुल मिलाकर लगभग 7.6 लाख छात्र वर्तमान में हिंदी सीख रहे हैं।
हिंदी के सापेक्ष अन्य भाषाओं का चयन बहुत कम रहा। कन्नड़ को 11,483 छात्रों ने, अंग्रेजी को 32,135 विद्यार्थियों ने, उर्दू को 5,544 और संस्कृत को 5,159 छात्रों ने तीसरी भाषा बनाया। अरबी मात्र 361 छात्रों द्वारा चुनी गई, जबकि क्षेत्रीय भाषाओं में तुलु को 845, कोंकणी को 34 और मराठी को सिर्फ तीन छात्रों ने पसंद किया।
नीति में बदलाव का प्रभाव
इस प्रवृत्ति के पीछे राज्य सरकार की नई नीति भी एक महत्वपूर्ण कारक मानी जा रही है। पहले एसएसएलसी परीक्षा में तीसरी भाषा के लिए 100 अंक निर्धारित थे, जो कुल 625 अंकों में जुड़ते थे। अब इस व्यवस्था को बदल दिया गया है और तीसरी भाषा के अंकों को कुल परिणाम में शामिल नहीं किया जाएगा। इसके lieu छात्रों को A, B, C और D जैसी ग्रेड प्रदान की जाएंगी।
पिछले महीने राज्य के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के मंत्री मधु बंगरप्पा ने बताया था कि यह नई ग्रेडिंग प्रणाली सभी थर्ड लैंग्वेज पर समान रूप से लागू होगी। शिक्षकों का मानना है कि इस बदलाव से विद्यार्थियों पर अंक आधारित दबाव कम हुआ है, जिससे वे ऐसी भाषा चुन रहे हैं जो उन्हें समझने और सीखने में आसान लगे।
शिक्षकों की राय
राज्य के शिक्षकों का कहना है कि नई नीति के लागू होने के बाद भाषा चुनने की प्रक्रिया छात्र-छात्राओं के लिए आसान हो गई है। थर्ड लैंग्वेज की नीति 시행 होने के बाद स्वाभाविक रूप से अधिकतर छात्र हिंदी की ओर झुकते हैं, क्योंकि इसे प्रमुख भाषाओं में से एक माना जाता है।
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